उधर तुम हो , ख़ुशी है
इधर बस बेबसी है
ये कैसी रौशनी है
अँधेरा ढो रही है
नहीं इक पल सुकूं का
ये कोई ज़िंदगी है
मुसीबत है , बुला ले
ये बाहर क्यों खड़ी है?
किनारे पर है कश्ती
किनारा ढूंढ़ती है
Saturday, 20 April 2024
उधर तुम हो , ख़ुशी है
Subscribe to:
Posts (Atom)
करतब ने भरमाई आँख
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
-
चलूँ ताज़ा ख़यालों से तेरी महफ़िल को महकाऊं है मौसम कोंपलों का क्यों कहानी ज़र्द दोहराऊँ कसे फिर साज़ के ए दिल, जो मैनें तार हिम्मत से मुझ...
-
ग़ज़ल हमसे मिलने कैसे भी करके बहाने आ गया यार अपना हाले-दिल सुनने –सुनाने आ गया कोंपलें फूंटी भार आने को थी कि फिर से वो ज़र्द मौसम लेक...
-
ग़ज़ल इम्काँ तो अच्छे देखे हैं कुछ बच्चे हँसते देखे हैं पलकों से अंगार उठाकर फूलों के सपने देखे हैं पीर न मेरे मन की देखी सबने लब हंसत...