उधर तुम हो , ख़ुशी है
इधर बस बेबसी है
ये कैसी रौशनी है
अँधेरा ढो रही है
नहीं इक पल सुकूं का
ये कोई ज़िंदगी है
मुसीबत है , बुला ले
ये बाहर क्यों खड़ी है?
किनारे पर है कश्ती
किनारा ढूंढ़ती है
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