Wednesday, 13 March 2024

ये रौनकें , ये महिफ़िलें , ये मेले इस जहान के-दस्तक


मुआमला  दिलों का ये  बड़ा ही पेचदार है 
कि जिसने ग़म दिए हमारा वो ही ग़म-गुसार है 

न मंज़िलों की है ख़बर न दूरियों का है पता 
भटक रहे हैं कब से हम ये कैसी रहगुज़ार है 


किसी ने भेजा आ गये ,बुला लिया चले गए 
कि मौत हो या ज़िंदगी , किसी का इख़्तियार है ?

ये रौनकें , ये महिफ़िलें , ये मेले इस जहान के
ए ज़िंदगी , ख़ुदा का भी तुझी से कारोबार है


उसी ने डाले मुश्किलों मे मेरे जान-ओ-दिल मगर
उसी पे जाँ निसार है , उसी पे दिल निसार है


तुमीं को हमने पा लिया , तुमीं को हमने खो दिया
तू ही हमारी जीत है, तू ही हमारी हार है

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