Tuesday, 12 March 2024

सलीबों को उठाना आ गया है*

सलीबों को उठाना आ गया है
मुझे जीवन बिताना आ गया है  

घड़े शहरों  में भी बिकने लगे हैं 
ज़माना फिर पुराना आ गया है 

चलो अच्छा नहीं आये हैं गिरधर 
हमें परबत उठाना आ गया है 

अलग कर  दो मुझे अब कारवाँ से 
रुको , मेरा ठिकाना आ गया है 

चढ़ा है रंग दुनिया का ब-ख़ूबी
तुम्हें भी  दिल दुखाना आ गया है  

शिकायत ही नहीं करता किसी से 
मुझे  रिश्ता निभाना आ गया है

ज़रा मुड़ कर सफ़र को याद कर लो
ए दरियाओ मुहाना आ गया  

पिता ख़ुश है कि बेटे को "ख़याल" अब 
दो टुक रोटी कमाना आ गया है 


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