करतब ने भरमाई आँख
सच को देख न पाई आँख
आवारा तितली जैसी
चेहरों पर मंडराई आँख
दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर
ख़ाली लौट के आई आँख
मंज़र , पस-मंज़र देखे
शाइर की दानाई आँख
देख सियासत-दानों की
हँसती है बलवाई आँख
याद आया कुछ बैठे-बैठे
भर आई सौदाई आँख
तकते–तकते राह “ख़याल”
दर पर भी उग आई आँख
मेरी पचास ग़ज़लें- सतपाल ख़याल
Monday, 6 January 2025
करतब ने भरमाई आँख
Wednesday, 9 October 2024
dastak- क्या है उस पार कोई शख़्स ये समझा न सका
Friday, 20 September 2024
बन के आँसू बिखर गया पानी-दस्तक
बन के आँसू बिखर गया पानी
चढ़ते-चढ़ते उतर गया पानी
पानियों को भी काट दे ये
कटार
इस सियासत से डर गया पानी
देख , सहमी हुई सी मछली को
कैसे पांनी से डर गया पानी
जल रहे घर की बात आई तो
फिर मदद को मुकर गया पानी
दूब की नोक पे हो शबनम ज्यूं
त्यूँ पलक पर ठहर
गया पानी
आँख तेरी ज़रा सी नम जो हुई
मेरी आँखों में भर गया पानी
जब से बिछड़ा "ख़याल"
बादल से
देख फिर दर-ब-दर गया पानी
Thursday, 19 September 2024
मुझको यूं ही उदास रहने दे- दस्तक
मुझको यूं ही उदास रहने दे
फ़ेंक दे जाम प्यास रहने दे
दुख मुझे रब से जोड़ देते हैं
दुख मेरे आस पास रहने दे
आज बोतल को मुंह लगायेंगे
आज साक़ी गिलास रहने दे
तू मुक़द्दर समझ अंधेरों को
रौशनी के क़ियास रहने दे
मत बता इनको ज़िंदगी क्या है
अपने बच्चे पुर-आस रहने
दे
ख़ुश रहेंगे तो फिर कहेंगे क्या
शायरों को उदास रहने दे
मैं तेरी दोस्ती से वाक़िफ़ हूँ
छोड़ ए ग़म-शनास , रहने दे
जिस्म अब राख हो चुका है “ख़याल”
जल चुका है लिबास रहने दे
बदल कर रुख़ हवा उस छोर से आये तो अच्छा है
बदल कर रुख़ हवा उस छोर से आये तो अच्छा है
मेरी कश्ती भी साहिल तक पहुँच जाये तो अच्छा है
मसाइल और भी मौजूद हैं इस के सिवा लेकिन
मोहब्बत का भी थोड़ा ज़िक्र हो जाये तो अच्छा
है
दिलों में उल्फ़तें
हों , ज़ेहन में चालाकियां
कम हों
कोई चंद ऐसे लोगों से जो मिलवाये तो
अच्छा है
गली तेरी , मकां तेरा , पता तेरा , पता किस को
कि तेरे शह्र का ही कोई मिल
जाये तो
अच्छा है
.
अदालत भी उसी की है , वकालत भी “ख़याल” उस की
वो पेचीदा दलीलों
में न उलझाये तो
अच्छा है
Monday, 16 September 2024
फिर से प्रेम की अलख जगा कर देखूँगा-दस्तक
फिर से प्रेम की अलख जगा कर
देखूँगा
पानी पर तस्वीर बना कर देखूँगा
गुज़रे वक़्त को आज पुकारूँगा
फिर से
मैं तुम को आवाज़ लगा कर
देखूँगा
ढालूंगा मैं आंसू अपने
शे’रों में
पानी से मैं दीप जला कर
देखूँगा
लोग सलीब उठा कर कैसे चलते
हैं
मैं इक शख़्स का बोझ उठा कर देखूँगा
कोई एक सवेर तो अच्छी आएगी
मैं उम्मीद की जोत जला कर
देखूँगा
हो सकता है कोई किनारा मिल
जाए
दूर उफ़क़ के पार मैं जा कर
देखूँगा
सच पर कैसे मर मिटते हैं
लोग “ख़याल”
मैं सूली पर शीश टिका कर देखूँगा
इम्काँ तो अच्छे देखे हैं-दस्तक
फूलों के सपने देखे हैं
Thursday, 5 September 2024
तुझ पे क़लम-कार ऐतबार नहीं है- दस्तक
तुझ पे क़लम-कार ऐतबार नहीं है
झूटे हैं अख़बार ए'तिबार नहीं है
डूब गए हम भँवर में तुझ को
बचाते
हम पे भी सरकार ऐतबार नहीं है
लब पे सजा
के रखी है सब ने बनावट
सब हैं अदाकार ऐतबार नहीं है
कौन यहां बेच दे ज़मीर किसी
को
ये तो है बाज़ार ऐतबार नहीं है
तेरा ख़ुदा हूँ यक़ीन कर के कभी
देख
फेंक दे पतवार ऐतबार नहीं है
कौन सुनेगा यहां
"ख़याल" तेरी बात
सज गए इजलास ऐतबार नहीं है
दुखी मन है ग़ज़ल कोई कही जाए-दस्तक
दुखी मन है ग़ज़ल कोई कही जाए
किसी अपने से दिल की बात की
जाए
ये नाज़ुक तार साँसों के तो
टूटेंगे
सदा-ए-साज़ जब तक है सुनी
जाए
खड़ी है बाल खोले दर पे
तन्हाई
ये विरहन या ख़ुदा दर से चली
जाए
खरी-खोटी, भली-चंगी जो दिल
में है
कहीं दिल में न रह जाए कही
जाए
“ख़याल” आते हैं दश्त-ए-दिल
में यूँ तेरे
किसी वीराने से जैसे नदी
जाए
झूठ को ठीक से बोलना सीखिए-दस्तक
झूठ को ठीक से बोलना सीखिए
ये हुनर सीखिए , ये अदा सीखिए
फ़ायदा जिस तरफ़ उस तरफ़ चल पड़ो
ये नया दौर है , कुछ नया सीखिए
ज़िंदगी वश में आई नहीं इल्म से
अब कोई टोना या टोटका सीखिए
फल रहा झूठ , झूठे
तरक़्क़ी पे हैं
छल-कपट का नया क़ायदा सीखिए
ज़िंदगी जो भी दे बस क़बूलो उसे
इस की लय-ताल पर नाचना सीखिए
छोड़िए फ़िक्र इक-दूसरे की “ख़याल”
सीखिए अपने हित साधना सीखिए
Saturday, 15 June 2024
इबादत बाद में पहले मगर रोटी ज़रूरी है *
न हो पूरी तो आधे चाँद सी आधी ज़रूरी है
उजालों पर तेरी तक़रीर से कुछ भी नहीं होगा
दिए में तेल से भीगी हुई बाती ज़रूरी है
शराफ़त का बहुत नुकसां उठाया है यहाँ मैं ने
मैं बच्चों को ये समझाता हूँ चालाकी ज़रूरी है
मसीहा की मसीहाई का चर्चा किस तरह होगा
ज़रूरी है यहाँ बीमार , बीमारी ज़रूरी है
अगर बारिश न हो सोचो तो क्या छतरी ज़रूरी है ?
ज़रा सा रोज़ मरने का भी मैं अभ्यास करता हूँ
कि मरना तय है तो मरने की तैयारी ज़रूरी है
वो सूरज तो नहीं उग आए अपने आप जो हर रोज़
वो हाकिम है उजालों के लिए अर्ज़ी ज़रूरी है
Thursday, 30 May 2024
चलो ताज़ा ख़यालों से तेरी महफ़िल को महकाऊं-दस्तक़
Saturday, 20 April 2024
उधर तुम हो , ख़ुशी है
उधर तुम हो , ख़ुशी है
इधर बस बेबसी है
ये कैसी रौशनी है
अँधेरा ढो रही है
नहीं इक पल सुकूं का
ये कोई ज़िंदगी है
मुसीबत है , बुला ले
ये बाहर क्यों खड़ी है?
किनारे पर है कश्ती
किनारा ढूंढ़ती है
Wednesday, 13 March 2024
ये रौनकें , ये महिफ़िलें , ये मेले इस जहान के-दस्तक
मुआमला दिलों का ये बड़ा ही पेचदार है
कि जिसने ग़म दिए हमारा वो ही ग़म-गुसार है
न मंज़िलों की है ख़बर न दूरियों का है पता
भटक रहे हैं कब से हम ये कैसी रहगुज़ार है
किसी ने भेजा आ गये ,बुला लिया चले गए
कि मौत हो या ज़िंदगी , किसी का इख़्तियार है ?
ये रौनकें , ये महिफ़िलें , ये मेले इस जहान के
ए ज़िंदगी , ख़ुदा का भी तुझी से कारोबार है
उसी ने डाले मुश्किलों मे मेरे जान-ओ-दिल मगर
उसी पे जाँ निसार है , उसी पे दिल निसार है
तुमीं को हमने पा लिया , तुमीं को हमने खो दिया
तू ही हमारी जीत है, तू ही हमारी हार है
Tuesday, 12 March 2024
सलीबों को उठाना आ गया है*
मुझे जीवन बिताना आ गया है
हमें परबत उठाना आ गया है
अलग कर दो मुझे अब कारवाँ से
रुको , मेरा ठिकाना आ गया है
चढ़ा है रंग दुनिया का ब-ख़ूबी
तुम्हें भी दिल दुखाना आ गया है
शिकायत ही नहीं करता किसी से
इस जमीं में है , आसमान में हैं *
इस जमीं में है , आसमान में हैं
उनकी मुश्किल तुम्हारे ध्यान में है ?
बड़बड़ाता है मुझ में रह-रह कर
क्या कोई और इस मकान में है
क्यों सितारों की आंखें नम -नम हैं
चाँद तो अब भी आसमान में है
ईंट गारे की फ़िक्र क्या करना
घर तो आख़िर तेरा मसान में है
देख बिखरा है घर सम्भाल इसे
तुमको रहना इसी मकान में है
Friday, 8 March 2024
तेरे बीमार रहने से ही ये बाज़ार चलता है*
तेरे बीमार रहने से ही ये बाज़ार चलता है
दवाऐं बेचने वालों का कारोबार चलता है
रखा जाता है हमको भूख बीमारी के साए में
कुछ ऐसे तौर से इस देश में व्यापार चलता है
वही लिक्खा है अख़बारों ने जो सरकार ने चाहा
सियासत के इशारों पर ही तो अख़बार चलता है
सजाएं भी आवार्डों की तरह मरने पे मिलती हैं
कुछ ऐसी चाल से इन्साफ का दरबार चलता है
सियासत काठ की हांडी जो बारंबार चढ़ जाए
ये वो सिक्का है , जो खोटा है , जो हर-बार चलता है
कमाता है कोई इतना के पड़पोते भी पल जाएं
कमाते हैं कई ता-उम्र बस घर -बार चलता है
लोग आते हैं , तडपते हैं ,चले जाते हैं फिर इक दिन
न जाने किसके कहने पर तेरा संसार चलता है
चढ़ते-चढ़ते उतर गया पानी*
चढ़ते-चढ़ते उतर गया पानी
बनके आंसू बिखर गया पानी
पानियों को भी काट दे ये कटार
इस सियासत से डर गया पानी
एक सहमी हुई सी मछली है
कैसे पांनी से डर गया पानी
जल रहे घर की बात आई तो
फिर मदद से मुकर गया पानी
दूब की नोक पे हो शबनम ज्यूं
त्यूँ पलक पे ठहर गया पानी
आंख तेरी ज़रा सी नम जो हुई
मेरी आँखों में भर गया पानी
जब से बिछड़ा "ख़याल" सागर से
देख फिर दर -ब -दर गया पानी
Tuesday, 20 February 2024
मैं शायर हूँ ज़बाँ मेरी कभी उर्दू कभी हिंदी*
कि मैंने शौक़ से बोली कभी उर्दू कभी हिंदी
यहाँ हिन्दी भी दुःख में है तो उर्दू भी परेशां है
हैं बेबस एक ही जैसी कभी उर्दू कभी हिंदी
अदब को तो अदब रखते ज़बानों पर सियासत क्यों
सियासत ने मगर बाँटी कभी उर्दू कभी हिंदी
जो आसां हो ,सरल ,सीधी , ज़बां अपनी
ये मेरी भी है तेरी भी, कभी उर्दू कभी हिंदी
Monday, 19 February 2024
New Ghazal- ख़यालों से बनाई क़ैद में था *
कभी मैं रौशनी की क़ैद में था
डरा पल तौलते ही वो अचानक
रिहाई हो रही थी तब मैं समझा
Sunday, 11 February 2024
मोहब्बत पुल बनाती है तो नफ़रत तोड़ देती है - नई ग़ज़ल *
Thursday, 1 February 2024
यूँ नहीं इस शहर में मेरा कोई भी घर नहीं -नई ग़ज़ल*
Saturday, 27 January 2024
जब उजाला हुआ तो दम तोड़ा *
एक ताज़ा ग़ज़ल
दैर तोड़ा , कभी हरम तोड़ा
जब उजाला हुआ तो दम तोड़ा
यूं तिल्सिम -ए - ग़म-ओ -अलम तोड़ा
आज फिर मय-कदे में बैठे हो
हमको तोड़ा है बेबसी ने बहुत
हमको हालात ने तो कम तोड़ा
Wednesday, 17 January 2024
खुदा को आपने देखा नहीं हैं *-New
Monday, 15 January 2024
New-फूल गिरे टहनी से तो भी आँखें नम हो जाती हैं *
तेज़ लवें भी जल-जलकर थोड़ी तो मद्धम हो जाती हैं
ज़ख्मों से उठ -उठ कर टीसें ख़ुद मरहम हो जाती हैं
छोटी –छोटी बातों पर अब दिल मेरा दुख जाता है
फूल गिरे टहनी से तो भी आँखें नम हो जाती हैं
Tuesday, 9 January 2024
बस इतना सा तो है किस्सा तुम्हारा -New*
बस इतना सा तो है किस्सा तुम्हारा
किसी ने जी लिया सोचा तुम्हारा
मोहब्बत का भरम कायम है अब तक
कभी परखा नहीं रिश्ता तुम्हारा
तुम्हें उस महजबीं से क्या तवक्कों
कभी देखा भी है चहरा तुम्हारा
हमारे हाथ छोटे थे ए किस्मत
कभी टूटा नहीं छीका तुम्हारा
बिना कारण ही डांटे तूने बच्चे
कहां निकला है अब गुस्सा तुम्हारा
तुम्हारी मेहनतों में सेंध मारी
किसी ने काटा है बोया तुम्हारा
बता क्या खोजती हो दादी अम्माँ
कबाड़ी ले गया चरखा तुम्हारा
"ख़याल" इस शायरी के शग़्ल में क्या
हुआ भी है कहीं चर्चा तुम्हारा
Thursday, 4 January 2024
साज़िशें हैं आदमी के मन से खेला जाएगा -New ghazal*
साज़िशें हैं आदमी के मन से खेला जाएगा
आपने क्या सोचना है ,ये भी सोचा जाएगा
आज जो मुट्ठी में है बालू उसे कस के पकड़
कल जो होगा ,कल वो होगा ,कल वो देखा जाएगा
आज़माना छोड़ रिश्ते को बचाना है अगर
टूट जायेगा ये रिश्ता जब भी परखा जाएगा
कोंपलें उम्मीद की फूटेंगी इसके बाद , पर
पहले इस टहनी से हर पत्ते को नोचा जायेगा
आदमी को आदमी से जिसने रक्खा जोड़कर
अब मोहब्बत का वो जर्जर पुल भी तोड़ा जाएगा
देखते हैं टूटती है सांस कैसे , कब , कहां
पेड़ से कब आख़िरी पत्ते को तोड़ा जाएगा
तय तो है मेरी सज़ा पहले से तेरी बज़्म में
अब बताने को कोई इलज़ाम खोजा जाएगा
दाँव पर ईमान भी मैंने लगा डाला "ख़याल"
खेल में अब आख़िरी यक्का भी फेंका जाएगा
दवा आई नई बाज़ार में क्या -New Ghazal*
ग़ज़ल – सतपाल ख़याल
ग़रीबों की गिरी दस्तार में क्या
कभी चर्चा हुआ सरकार में क्या
बहुत ख़बरें हैं बीमारी की फिर से
दवा आई नई बाज़ार में क्या
सियासत की सियाही थी क़लम में
हुआ था क्या , छपा अख़बार में क्या
रुकी है जांच , सब आरोप ख़ारिज
वो शामिल हो गए सरकार में क्या
कहानी लिखने वाले में है सब कुछ
बुरा -अच्छा किसी किरदार में क्या
जो ताक़त है क़लम की धार में वो
किसी भाले में या तलवार में क्या
जहां देखो , जिसे देखो , दुखी है
सुखी भी है कोई संसार में क्या ?
"ख़याल" अब रेस में शामिल नहीं हम
इस अंधी दौड़ में , रफ़्तार में क्या
Wednesday, 20 December 2023
Punjabi Ghazal- ਨਹਿਰ ਦੇ ਕੰਢੇ ਕਿੱਕਰ ਥੱਲੇ ਬੈਠ ਗਏ
बैठे -बैठे सोच रहे हैं क्या -क्या कुछ- New
बैठे -बैठे सोच रहे हैं क्या -क्या कुछ
दुनिया में हम देख चुके हैं क्या -क्या कुछ
प्यार, मोहब्बत ,रिश्ते -नाते और वफ़ा
सच ,खुद्दारी , नेकी ,
हम जैसों को रोग लगे हैं क्या क्या कुछ
बचपन ,यौवन , पीरी , मरघट
हैरत से हम देख रहे हैं क्या -क्या कुछ
बेटा , भाई , मालिक ,नौकर या शौहर
नाटक में हम रोज़ बने हैं क्या -क्या कुछ
जिस्म ,ईमान की इस मंडी में सब कुछ है
देखो तो सब बेच रहे हैं क्या क्या कुछ
करते हैं अब कूच सराये- फ़ानी से
इन आंखों से देख चले हैं क्या -क्या कुछ
रेत ,समुन्द्र ,फूल ,बगीचे ,दफ़तर ,घर
गजलों में अहसास बने हैं क्या -क्या कुछ
कल कुछ अच्छा होने की उम्मीद "ख़याल"
इस उम्मीद से ख़्वाब सजे हैं क्या क्या कुछ
Monday, 18 December 2023
मैं आँखें देख कर हर शख़्स को पहचान सकता हूँ- उड़ान
मैं आँखें देख कर हर शख़्स को पहचान लेता हूँ
बिना जाने ही अकसर मैं बहुत कुछ जान लेता हूँ
वो कुछ उतरा हुआ चहरा, वो कुछ सहमी हुई आँखें
मुहब्बत करने वालों को तो मैं पहचान लेता हूँ
तजुर्बों ने सिखाई है मुझे तरकीब कि मैं अब
मुसीबत सर उठाये तो मैं सीना तान लेता हूँ
करतब ने भरमाई आँख
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
-
ਤਪਦੀ ਰਾਹ ਤੇ ਕੱਲ੍ਹੇ ਚੱਲੇ , ਬੈਠ ਗਏ ਯਾਦ ਤੇਰੀ ਦੇ ਰੁੱਖੜੇ ਥੱਲੇ , ਬੈਠ ਗਏ ਕੀ -ਕੀ ਆਇਆ ਯਾਦ ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ਕੀ ਦੱਸਾਂ ਤੇਰੇ ਸ਼ਹਿਰ ਚ ਜਾਕੇ ਕੱਲੇ ਬੈਠ ਗਏ ਮੁੜਕ...
-
इस जमीं में है , आसमान में हैं गर ख़ुदा है तो किस जहान में है मुश्किलों में है तेरे बंदे, ख़ुदा उनकी मुश्किल तुम्हारे ध्यान में है ? बड़बड़ात...
-
मोहब्बत पुल बनाती है तो नफ़रत तोड़ देती है कि हर सदभाव का धागा सियासत तोड़ देती है कोई मज़बूत कितना भी हो ग़ुर्बत तोड़ देती है ग़रीबों ...