फिर से प्रेम की अलख जगा कर
देखूँगा
पानी पर तस्वीर बना कर देखूँगा
गुज़रे वक़्त को आज पुकारूँगा
फिर से
मैं तुम को आवाज़ लगा कर
देखूँगा
ढालूंगा मैं आंसू अपने
शे’रों में
पानी से मैं दीप जला कर
देखूँगा
लोग सलीब उठा कर कैसे चलते
हैं
मैं इक शख़्स का बोझ उठा कर देखूँगा
कोई एक सवेर तो अच्छी आएगी
मैं उम्मीद की जोत जला कर
देखूँगा
हो सकता है कोई किनारा मिल
जाए
दूर उफ़क़ के पार मैं जा कर
देखूँगा
सच पर कैसे मर मिटते हैं
लोग “ख़याल”
मैं सूली पर शीश टिका कर देखूँगा
Monday, 16 September 2024
फिर से प्रेम की अलख जगा कर देखूँगा-दस्तक
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
करतब ने भरमाई आँख
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
-
इस जमीं में है , आसमान में हैं गर ख़ुदा है तो किस जहान में है मुश्किलों में है तेरे बंदे, ख़ुदा उनकी मुश्किल तुम्हारे ध्यान में है ? बड़बड़ात...
-
चलूँ ताज़ा ख़यालों से तेरी महफ़िल को महकाऊं है मौसम कोंपलों का क्यों कहानी ज़र्द दोहराऊँ कसे फिर साज़ के ए दिल, जो मैनें तार हिम्मत से मुझ...
-
मोहब्बत पुल बनाती है तो नफ़रत तोड़ देती है कि हर सदभाव का धागा सियासत तोड़ देती है कोई मज़बूत कितना भी हो ग़ुर्बत तोड़ देती है ग़रीबों ...
No comments:
Post a Comment