Monday, 16 September 2024

फिर से प्रेम की अलख जगा कर देखूँगा-दस्तक

 
फिर से प्रेम की अलख जगा कर देखूँगा
पानी पर तस्वीर बना कर देखूँगा
 
गुज़रे वक़्त को आज पुकारूँगा फिर से
मैं तुम को आवाज़ लगा कर देखूँगा
 
ढालूंगा मैं आंसू अपने शे’रों में
पानी से मैं दीप जला कर देखूँगा
 
लोग सलीब उठा कर कैसे चलते हैं
मैं इक शख़्स  का बोझ उठा कर देखूँगा
 
कोई एक सवेर तो अच्छी आएगी
मैं उम्मीद की जोत जला कर देखूँगा
 
हो सकता है कोई किनारा मिल जाए
दूर उफ़क़ के पार मैं जा कर देखूँगा
 
सच पर कैसे मर मिटते हैं लोग “ख़याल”
मैं सूली पर शीश  टिका कर देखूँगा

No comments:

Post a Comment

करतब ने भरमाई आँख

करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख   आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख   दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी   फिर ख़ाली लौट के आई आँख   मंज़र ,  पस-मंज़...