इम्काँ तो अच्छे देखे हैं
ग़ुंचे, गुल बनते देखे हैं
किस ने मधुवन महका
देखा
किस ने दिन अच्छे देखे हैं
भूख , ग़रीबी और लाचारी
मेहनत के तमग़े देखे हैं
पलकों से अंगार उठाकर
फूलों के सपने देखे हैं
फूलों के सपने देखे हैं
आवारा से बादल थे कुछ
सहरा से लड़ते देखे हैं
वक़्त की शाख़ों पर कुछ लम्हें
कलियों से चटके देखे हैं
कलियों से चटके देखे हैं
झूठे , कपटी और फ़रेबी
सब तेरे जैसे देखे हैं
पीर “ख़याल” न देखी मन की
सब ने लब हंसते देखे हैं
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