चलूँ ताज़ा ख़यालों से तेरी महफ़िल को महकाऊं
है मौसम कोंपलों का क्यों कहानी ज़र्द दोहराऊँ
कसे फिर साज़ के ए दिल, जो मैनें तार हिम्मत से
मुझे तुम रोक लेना गर पुराना गीत मैं गाऊँ
मुझे सोहबत में अपनी रख मेरे मौला, मेरे साईं
कि मैं फिर से किसी गुल की मोहब्बत मे न मर जाऊँ
मोहब्बत से ही मुमकिन है कि रौशन हों हमारे दिल
मै लेकर लौ मोहब्बत की अब आंगन तक तो आ जाऊँ
मोहब्बत के चराग़ों से चलो हम रौशनी बाँटें
उधर से तुम चले आओ इधर से मैं चला आऊं
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