Wednesday, 4 January 2023

ग़ज़ल -28- इम्काँ तो अच्छे देखे हैं- उड़ान*

 
ग़ज़ल

इम्काँ तो अच्छे देखे हैं
कुछ बच्चे हँसते देखे हैं 

 
पलकों से अंगार उठाकर
फूलों के सपने देखे हैं
 
पीर न मेरे मन की देखी
सबने लब हंसते देखे हैं
 
आवारा से बादल थे कुछ
सहरा से लड़ते देखे हैं
 
 
अख़बारें भी हैं दरबारी
क़लमों पर पहरे देखे हैं
 
आंखों के तारे भी मैनें
आंखों से गिरते  देखे हैं
 
 
वक़्त की  शाख़ों पर कुछ लम्हें
फूलों से महके  देखे हैं
 
मधुवन महका किसने देखा
किसने दिन अच्छे देखे हैं
 
झूठे ,कपटी और फरेबी
सब तेरे जैसे देखे हैं
 
उड़ने की ख़्वाहिश थी जिनकी
पिंजरों में बैठे देखे हैं
 
भूख , गरीबी और लाचारी
मेहनत के तमगे  देखे हैं
 
कौन “ख़याल” दिखाए रस्ता
ख़ुद रहबर भटके देखे हैं
 
 

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