ग़ज़ल
करतब ने भरमाई
आँख
सच को देख न पाई
आँख
आवारा तितली जैसी
चहरों पर मंडराई
आँख
आंखों में लहराती
है
मृग सी इक सहराई
आँख
दूर उफक़ तक दौड़ी पर
खाली लौट के आई
आँख
रेशम से सपनों का
घर
और सच की रानाई
आँख
मंजर, पस- मंजर देखे
शाइर की दानाई आँख
देख सियासतदानों
की
हंसती है बलवाई
आँख
याद आया कुछ बैठे
–बैठे
भर आई सौदाई आँख
चहरा खोज रही
किसका
चहरों से टकराई
आंख
तकते-तकते राह “ख़याल “
दर पर भी उग आई
आँख
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