ग़ज़ल
हमसे मिलने कैसे
भी करके बहाने आ गया
यार अपना हाले-दिल
सुनने –सुनाने आ गया
कोंपलें फूंटी भार
आने को थी कि फिर से वो
ज़र्द मौसम लेके हमको
आजमाने आ गया
मजहबी उन्माद भडका
जब हमारे शह्र में
मेरा हमसाया ही मेरा
घर जलाने आ गया
वक़्त ने कल फूंक
डाला था चमन मेरा मगर
आज वो कुछ फूल गमलों
में उगाने आ गया
बह गईं सैलाब में सब
हस्ती गाती बस्तियां
अब वो गोवर्धन को उंगली
पे उठाने आ गया
कुछ ही दिन बीते
ख़याल अपने यहाँ पर चैन से
फेर फिर तकदीर का
हमको डराने आ गया
Monday, 20 November 2023
हमसे मिलने कैसे भी करके बहाने आ गया-उड़ान *
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