Wednesday, 9 October 2024

dastak- क्या है उस पार कोई शख़्स ये समझा न सका

 क्या है उस पार कोई  शख़्स ये समझा न सका
क्या जगह है जो गया लौट के फिर आ न सका
 
मैं तो आदी था विरासत में मिले ग़म मुझ को
जो
जो मेरे साथ रहा वो  भी  ख़ुशी पा न सका
 
टूटे पत्तों  को शजर बन के निहारा मैं ने
जो गए छोड़ मुझे उन को कभी ला न सका
 
किस से मिलना है गले हाथ मिलाना किस से
फ़ासला किस से रखूँ कितना समझ आ न सका

बस ये भीगी सी है जो रेत यही साथी है
एक सूखा सा मैं दरिया हूँ जो लहरा न सका

इक सिरा सुलझे तो उलझा है कोई दूजा सिरा
ज़िंदगी ऐसे कुछ उलझी कि मैं सुलझा न सका
 
दरमियाँ थी ये मुक़द्दर की ही दीवार “ख़याल”
वो इधर आ न सका , मैं भी उधर जा न सका


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