करतब ने भरमाई आँख
सच को देख न पाई आँख
आवारा तितली जैसी
चेहरों पर मंडराई आँख
दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर
ख़ाली लौट के आई आँख
मंज़र , पस-मंज़र देखे
शाइर की दानाई आँख
देख सियासत-दानों की
हँसती है बलवाई आँख
याद आया कुछ बैठे-बैठे
भर आई सौदाई आँख
तकते–तकते राह “ख़याल”
दर पर भी उग आई आँख
Monday, 6 January 2025
करतब ने भरमाई आँख
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करतब ने भरमाई आँख
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
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