ग़ज़ल
जिन्न बोतल से निकाले जायेंगे
आज फिर मुद्द्धे उछाले जायेंगे
ताल वो फिर से खँगाले जाएँगे
इस तरफ मस्जिद गिरी तो उस तरफ़
राम,मंदिर से निकाले जाएँगे
मुँह से बच्चों के निवाले जाएँगे
गेंद के जैसे उछाले जाएँगे
कैसे ये पत्ते सँभाले जाएँगे
ज़िंदगी से अब उजाले जाएँगे
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