Wednesday, 4 January 2023

ग़ज़ल-24- आज फिर मुद्द्धे उछाले जायेंगे-उड़ान *

 
ग़ज़ल
जिन्न बोतल से निकाले जायेंगे
आज फिर मुद्द्धे उछाले जायेंगे
 
वक्त की काई जिन्हें ढकती रही
ताल वो फिर से खँगाले जाएँगे

इस तरफ मस्जिद गिरी तो उस तरफ़
राम,मंदिर से निकाले जाएँगे
 
मुफ़लिसी में बाप का साया गया
मुँह से बच्चों के निवाले जाएँगे
 
आज संसद में हमारे सब सवाल
गेंद के जैसे उछाले जाएँगे
 
तेज़ तूफ़ाँ मे दरख्तों से भला
कैसे ये पत्ते सँभाले जाएँगे
 
वो रहे लश्कर अँधेरों के 'ख्याल'
ज़िंदगी से अब उजाले जाएँगे
 

No comments:

Post a Comment

करतब ने भरमाई आँख

करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख   आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख   दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी   फिर ख़ाली लौट के आई आँख   मंज़र ,  पस-मंज़...