ग़ज़ल
कितने रंगीं , हसीन थे पिंजरे
फिर परिंदों को भा गये पिंजरे
चीख़ उठे क़ैद में पले पंछी
जैसे ही टूटने लगे पिंजरे
एक मुद्दत से क़ैद हैं हम लोग
अब हमें घर से लग रहे पिंजरे
मेरी आँखों में आसमान तो था
ज़ेहन में झूलते रहे पिंजरे
आसमानों से खौफ़ आया मुझे
फिर मेरे साथ ही उड़े पिंजरे
फिर मेरे साथ ही उड़े पिंजरे
हम खुले पिंजरों में बैठे रहे
इस क़दर हमको भा गये पिंजरे
रूह पंछी सी उड़ गई फुर्र से
देख खाली से रह गये पिंजरे
बुन के रक्खे हैं ज़हन में जो "ख़याल "
कर के हिम्मत उधेड़ दे पिंजरे
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