Wednesday, 4 January 2023

ग़ज़ल -14 -इनके –उनके , सब अख़बार-उड़ान *

 
ग़ज़ल
 
इनके –उनके , सब अख़बार
सच लिखते हैं कब अख़बार ?
 
दौर गया वो, होते थे
तोप मुक़ाबिल जब अख़बार
 
कितना सच कब कहना है
सीख गये गये हैं ढब अख़बार
 
आंखें सुनने को बेचैन
कब खोलेंगे लब अख़बार
 
हुक्का भरते सत्ता का
बन बैठे हैं रब्ब अख़बार
 
अखबारों की सरकारें
सरकारों के अब अख़बार
 
जनसत्ता गिरती है ख़याल
गिर जाते हैं जब अख़बार
 
 
 

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