ग़ज़ल
सच लिखते हैं कब अख़बार ?
तोप मुक़ाबिल जब अख़बार
सीख गये गये हैं ढब अख़बार
कब खोलेंगे लब अख़बार
बन बैठे हैं रब्ब अख़बार
सरकारों के अब अख़बार
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
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