Wednesday, 4 January 2023

ग़ज़ल -13- अर्ज़ी दी तो निकली धूप-(धूप -2)उड़ान *

 
ग़ज़ल

अर्ज़ी दी तो निकली धूप
कोहरे ने ढक ली थी धूप
 
दो क़दमों पर मंजिल थी
ज़ोरों से फिर बरसी धूप
 
बूढ़ी अम्मा बुनती थी
गर्म स्वैटर जैसी धूप
 
धूप में तरसे साए को
साए में याद आई धूप
 
भूखी नंगी बस्ती ने
खाई जूठन पहनी धूप
 
फुनगी पर आ बैठी देख
कितनी शातिर निकली धूप
 
साए में ही रहते हो
देखी भी है तीखी धूप ?
 
गुरबत के चूल्हे पे है
फ़ाकों की फीकी सी घूप
 
गज़लों के चरखे पे नित
अहसासों की काती धूप
 
ढलती शाम ने देखी है
लाठी लेकर चलती धूप
 
चाय के कप में उबली
अखबारों की सुर्खी धूप
 
विधवा की पेंशन सी है
घटती है न बढ़ती धूप
 
जीवन क्या है बोल ख़याल
खट्टी-मीठी तीखी धूप
 
 

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