ग़ज़ल
अर्ज़ी दी तो निकली धूप
कोहरे ने ढक ली थी धूप
ज़ोरों से फिर बरसी धूप
गर्म स्वैटर जैसी धूप
साए में याद आई धूप
खाई जूठन पहनी धूप
कितनी शातिर निकली धूप
देखी भी है तीखी धूप ?
फ़ाकों की फीकी सी घूप
अहसासों की काती धूप
लाठी लेकर चलती धूप
अखबारों की सुर्खी धूप
घटती है न बढ़ती धूप
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