Wednesday, 4 January 2023

ग़ज़ल-12- जो मांगो वो कब मिलता है-उड़ान *

 
ग़ज़ल
 
जो मांगो वो कब मिलता है
अबके हमने दुःख मांगा है
 
घर में हाल बज़ुर्गों का अब
पीतल के बरतन जैसा है
 
नाती पोतों ने ज़िद्द की तो
अम्मा का संदूक खुला है
 
हाथ से उसने दी थीं गाँठें
अब  दांतों से खोल रहा है
 
अब तुम राख उठा कर देखो
क्या -क्या जिस्म के साथ जला है
 
दूर वसो या पास रहो अब
रिश्तों का पल टूट चुका है
 
दूब चमकती है खेतों में
बरगद चिंता मेँ  डूबा है
 
रोती आँखें हँसता चेहरा
अंगारों पर फूल खिला है
 
आँखों से है ओझल मंज़िल
पैरों से रस्ता लिपटा है
 
डूब रही दो आंखें हैं और
बुझती सी फ़ानी दुनिया है
 
 
कोहरे में लिपटी है बस्ती
सूरज भी जुगनू लगता है
 
 
याद ” ख़याल” आई फिर उसकी
आँखों से आंसू  टपका है

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