ग़ज़ल
अबके हमने दुःख मांगा है
पीतल के बरतन जैसा है
अम्मा का संदूक खुला है
अब दांतों से खोल रहा है
क्या -क्या जिस्म के साथ जला है
रिश्तों का पल टूट चुका है
बरगद चिंता मेँ डूबा है
अंगारों पर फूल खिला है
पैरों से रस्ता लिपटा है
बुझती सी फ़ानी दुनिया है
सूरज भी जुगनू लगता है
आँखों से आंसू टपका है
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