Wednesday, 4 January 2023

ग़ज़ल-11- हो न हो मंज़िल -उड़ान*

 
हो न हो मंज़िल सफ़र इक मुख़्तसर मेरा भी है
वक़्त की सूली पे लटका एक सर मेरा भी है
 
मैं कि दरिया की तरह बहता नहीं हूँ रात-दिन
हूँ तो इक तालाब ही लेकिन सफ़र मेरा भी है
 
एक ही मौसम उदासी का है सदियों से जहाँ
दर्द की उन बस्तियों में एक घर मेरा भी है
 
ऐ मिरे मौला ! मुझे बस अपनी रहमत से नवाज़
`आसमाँ इक चाहिये मुझको कि सर मेरा भी है
 
तू अकेला ही नहीं है फ़िक्रे-दुनिया में ख़याल
सोच के सागर में डूबा देख सर मेरा भी है
 
 
 

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