हो न हो मंज़िल सफ़र इक मुख़्तसर मेरा भी है
वक़्त की सूली पे लटका एक सर मेरा भी है
हूँ तो इक तालाब ही लेकिन सफ़र मेरा भी है
दर्द की उन बस्तियों में एक घर मेरा भी है
`आसमाँ इक चाहिये मुझको कि सर मेरा भी है
सोच के सागर में डूबा देख सर मेरा भी है
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
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