Wednesday, 4 January 2023

ग़ज़ल-10 -किसी रहबर का मज़लूमों से -उड़ान *

 
ग़ज़ल
 
किसी रहबर का मज़लूमों से कोई बास्ता , कब था
झुलसते पांवों का तक़रीर में भी तज़्किरा , कब था
 
हमें ऐ वक़्त ! अपने आज में जीना तो आ जाता
मगर कल और कल के दरमियां में फासला कब था
 
कोई कारण नहीं था रौशनी के दूर रहने का
अंधेरी कोठरी में रौशनी को रास्ता कब था
 
ज़माना है , ये आदम के ज़माने से ही ऐसा है
बुरा कहते हो जिसको तुम ,कहो तो ये भला कब था
 
बहुत कुछ पूछना था और बतलाना बहुत कुछ था
"ख़याल " उस शख़्स से लेकिन हमारा राब्ता कब था
 
 
 
 

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