ग़ज़ल
झुलसते पांवों का तक़रीर में भी तज़्किरा , कब था
मगर कल और कल के दरमियां में फासला कब था
अंधेरी कोठरी में रौशनी को रास्ता कब था
बुरा कहते हो जिसको तुम ,कहो तो ये भला कब था
"ख़याल " उस शख़्स से लेकिन हमारा राब्ता कब था
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
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