ग़ज़ल
यारो ये तिश्नगी का सफ़र, कुछ न पूछिए
कैसा था खुशबुओं सफ़र, कुछ न पूछिए
सूनी है किस क़दर ये डगर, कुछ न पूछिए
जीना था ज़िंदगी को मगर, कुछ न पूछिए
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
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