Wednesday, 4 January 2023

ग़ज़ल- 9 -सहरा में कैसे भटकी नज़र -उड़ान *

 
ग़ज़ल
 
सहरा में कैसे भटकी नज़र  , कुछ न पूछिए
यारो ये तिश्नगी का सफ़र,  कुछ न पूछिए
 
तलवों से रिस रहा है लहू ,दिल में है चुभन
कैसा था खुशबुओं सफ़र,   कुछ न पूछिए
 
तन्हाइयों के साये ही फैले हैं दूर तक
सूनी है किस क़दर ये डगर,  कुछ न पूछिए
 
कांधों पे लाश अपनी ही लेकर चले रहे
जीना था ज़िंदगी को मगर,  कुछ न पूछिए
 
इक तीर के निशाने पे दिल अपना है 'ख़याल '
कहती है हमसे क्या वो नज़र , कुछ न पूछिए
 
 

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