ग़ज़ल
मौत के डर से मर गई मछली
फिर मगर को अखर गई मछली
मनका -मनका बिखर गई मछली
पानियों में उतर गई मछली
मन जिधर था उधर गई मछली
पैठ गहरे में कर गई मछली
आज फिर अपने घर गई मछली
देखिए तो किधर गई मछली
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
No comments:
Post a Comment