ग़ज़ल
जब से
बाज़ार हो गई दुनिया
तब से बीमार हो गई दुनिया
चंद तकनीक बाज़ हाथों में
एक औज़ार हो गई दुनिया
जैसे जैसे दवाएं बढती गईं
और बीमार हो गई दुनिया
मरते लोगों को बेचती बीमा
डर का व्योपार हो गई दुनिया
जलते लावे सी गंध आने लगी
सुर्ख अंगार हो गई दुनिया
जब से रुकने को मौत मान लिया
तेज़ रफ्तार हो गई दुनिया
कोई झूटी सी खबर लगती है
एक अखबार हो गई दुनिया
क्यों कफन इश्तहार बनने लगे
कैसे सरकार हो गई दुनिया
कुछ व्बाओं से कुछ दवाओं से
एक आज़ार हो गई दुनिया
है खुले पिंजरे में कैद “ख़याल”
ख़ुद गिरफ्तार हो गई दुनिया
Wednesday, 4 January 2023
ग़ज़ल -7 - जब से बाज़ार हो गई दुनिया-उड़ान *
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