कैसे मुश्किल रास्तों से बिन रुके गुज़री नदी
डूबना ही था तो क्यों फिर इस तरह भटकी नदी
ग़म तेरा अब भी मेरे सीने में है महफूज़ यूं
जैसे वीराने में इक चुप - चाप सी बहती नदी
लिखने वाले के लिखे किरदार से मजबूर थी
आप कहते हैं की अपने शौक़ से डूबी नदी
मैं अगर ठहरी तो मर जाउंगी मैं इसकी तरह
देख कर तालाब अपने आप से बोली नदी
शायरी में नर्म लहजा काम आता है बहुत
पत्थरों को काटती है एक नाज़ुक सी नदी
डूबने देता नहीं मुझको मेरा परवर-दिगार
फेंक दी पतवार मैंने देख कर बिफरी नदी
बस तेरे काजल की रेखा ने ही रोका था इसे
देख कर मुझको तेरी आंखों से पर छलकी नदी
डूबने के फ़न में माहिर हो गये जब से “ख़याल”
नाव सी लगने लगी है अब हमें गहरी नदी
No comments:
Post a Comment