Wednesday, 4 January 2023

ग़ज़ल -पाँच - साँसों की नाज़ुक टहनी पर पत्ता मैं -उड़ान*

साँसों की नाज़ुक टहनी पर पत्ता मैं
तूफ़ानों की बात चली तो सहमा मैं

क्या खोया, क्या पाया ,आज हिसाब किया
बन कर आँसू आंख से अपनी छलका मैं

ख़ुद-ग़र्ज़ी के खेल-तमाशे देखे हैं
मेले जैसी सारी दुनिया , तन्हा मैं

तेरी बातों में झलकी दुनियादारी
मैं जैसा था वैसा हूँ , कब बदला मैं ?

एक आंसू से काजल सा घुल जाऊँगा
कुछ जिसकी ताबीर नहीं वो सपना मैं

कल तक तेरी आंख का तारा था लेकिन
आज ज़रूरत ख़त्म हुई तो खटका मैं

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