साँसों की नाज़ुक टहनी पर पत्ता मैं
तूफ़ानों की बात चली तो सहमा मैं
तूफ़ानों की बात चली तो सहमा मैं
ख़ुद-ग़र्ज़ी के खेल-तमाशे देखे हैं
मेले जैसी सारी दुनिया , तन्हा मैं
तेरी बातों में झलकी दुनियादारी
मैं जैसा था वैसा हूँ , कब बदला मैं ?
एक आंसू से काजल सा घुल जाऊँगा
कुछ जिसकी ताबीर नहीं वो सपना मैं
कल तक तेरी आंख का तारा था लेकिन
आज ज़रूरत ख़त्म हुई तो खटका मैं
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