Wednesday, 4 January 2023

ग़ज़ल- चार -ग़म के भी आसमान कितने हैं -उड़ान *

ग़म के भी आसमान कितने हैं
ज़ब्त के इम्तिहान कितने हैं
वो मुझे अब भी प्यार करता है
दिल में वहम-ओ-गुमान कितने हैं
कल ये दुनिया बदल भी सकती है
लोग भी ख़ुश-गुमान कितने हैं
गोशे-गोशे में ख़ार बिखरे हैं
कहने को बाग़बान कितने हैं
मैंने सच बोलने की ठानी है
अब मेरे इम्तिहान कितने हैं
रात को दिन कहा गया अक्सर
ये सियासी बयान कितने हैं
घर भी , दफ़्तर भी , शाइरी भी “ख़याल “
एक जाँ , इम्तिहान कितने हैं

No comments:

Post a Comment

करतब ने भरमाई आँख

करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख   आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख   दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी   फिर ख़ाली लौट के आई आँख   मंज़र ,  पस-मंज़...