ग़म के भी आसमान कितने हैं
ज़ब्त के इम्तिहान कितने हैं
कल ये दुनिया बदल भी सकती है
लोग भी ख़ुश-गुमान कितने हैं
गोशे-गोशे में ख़ार बिखरे हैं
कहने को बाग़बान कितने हैं
मैंने सच बोलने की ठानी है
अब मेरे इम्तिहान कितने हैं
रात को दिन कहा गया अक्सर
ये सियासी बयान कितने हैं
घर भी , दफ़्तर भी , शाइरी भी “ख़याल “
एक जाँ , इम्तिहान कितने हैं
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