Wednesday, 4 January 2023

ग़ज़ल-तीन -मेरे ज़ब्त से हारी धूप -उड़ान*

 मेरे ज़ब्त से हारी धूप
साये में जा बैठी धूप
अम्माँ के चश्में से देख
टूटी –फूटी धुंधली धूप
रोटी पर मक्खन जैसी
आँगन में है बिखरी धूप
कोहरे से छन कर निकली
गर्म स्वेटर जैसी धूप
सुख के साए तुम रक्खो
हमने रख ली ग़म की धूप
सर्द दिसम्बर और चाय
थरमस से ज्यूं निकली धूप
बादल था रूमाल सा इक
पीतल के छल्लों सी धूप
नित पूरब के शिखरों पर
घुटनों के बल चढ़ती धूप



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