ग़ज़ल
तुझे ज़िंदगी यूँ बिताया है मैनें
कि पलकों से अंगार उठाया है मैनें
अंधेरों से लड़ना शुमार आदतों में
उजाला नज़र में छुपाया है मैनें
हरिक मोड़ पर बस बदी ही खड़ी थी
बचा जितना दामन बचाया है मैंने
किसी से मुहब्बत , किसी से अदावत
कि हर एक रिश्ता , निभाया है मैनें
किसी पे ये तोहमत धरूँ क्यों “ख़याल” अब
कि ख़ुद अपना दामन जलाया है मैंने
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