साज़िशें थीं, बिफर गया दरिया
मैं जो डूबा उतर गया
दरिया
कितने परबत डुबो के आया था
एक तिनके से डर गया दरिया
कश्तियां जब दुआएं करने लगीं
रफ्ता-रफ्ता उतर गया दरिया
दफ़्न सागर में हो गया आख़िर
यूँ तो , अपने ही घर गया दरिया
फिर वहां लौट कर नहीं आता
जिन पुलों से गुज़र गया दरिया
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