Wednesday, 4 January 2023

ग़ज़ल -एक -साज़िशें थीं, बिफर गया दरिया- उड़ान *

 

साज़िशें थीं, बिफर गया दरिया

मैं जो डूबा  उतर  गया दरिया

 

कितने परबत  डुबो के  आया था

एक  तिनके से  डर  गया दरिया

 

कश्तियां जब दुआएं करने लगीं

रफ्ता-रफ्ता उतर गया दरिया

 

दफ़्न सागर में हो गया आख़िर

यूँ तो , अपने ही घर गया दरिया

 

फिर वहां लौट कर  नहीं आता

जिन पुलों से गुज़र गया दरिया

 

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