ग़ज़ल
दरिया से तालाब हुआ हूँ
अब मैं बहना भूल गया हूँ.
साहिल पर कुछ देर बचा हूँ
बिकने मैं बाज़ार चला हूँ
दाँतों से वो खोल रहा हूँ
अब मैं तुझको भूल गया हूँ
दूर जिसे मैं छोड़ आया हूँ.
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
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