क्या है उस पार, कोई शख़्स ये समझा न सका
क्या जगह है जो गया, लौट के फिर आ न सका
मैं तो आदी था , विरासत में मिले ग़म मुझको
जो मेरे साथ रहा वो भी ख़ुशी पा न सका
टूटे पत्तों को शजर बनके निहारा मैनें
जो गए उनको मनाकर भी मैं घर ला न सका
किससे मिलना है गले, हाथ मिलाना किससे
फ़ासला किससे रखूँ कितना समझ आ न सका
मैं सफ़र में हूँ यही रेत मुक़द्दर है मेरा
एक सूखा हुआ दरिया हूँ मैं लहरा न सका
इक सिरा सुलझे तो उलझा है कोई दूजा सिरा
ज़िंदगी ऐसे कुछ उलझी कि मैं सुलझा न सका
दरमियाँ थी वो मुक़द्दर की ही दीवार “ख़याल”
तू इधर आ न सका , मैं भी उधर जा न सका
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