Wednesday, 4 January 2023

ग़ज़ल -20-क्या है उस पार, ? उड़ान *


क्या  है  उस  पार,  कोई  शख़्स  ये  समझा  न सका
क्या  जगह  है  जो  गया,  लौट  के फिर  आ  न सका
 
मैं तो आदी था , विरासत में मिले  ग़म  मुझको
जो  मेरे  साथ  रहा  वो  भी  ख़ुशी पा  न सका
 
टूटे  पत्तों  को  शजर  बनके  निहारा  मैनें
जो  गए  उनको  मनाकर  भी  मैं घर  ला  न सका
 
किससे  मिलना  है  गले,  हाथ  मिलाना  किससे
फ़ासला  किससे  रखूँ  कितना  समझ  आ  न सका

मैं  सफ़र  में  हूँ  यही  रेत  मुक़द्दर  है मेरा
एक सूखा हुआ दरिया हूँ मैं लहरा न सका

इक सिरा सुलझे तो उलझा है कोई दूजा सिरा
ज़िंदगी ऐसे कुछ उलझी कि मैं सुलझा न सका
 
दरमियाँ थी वो मुक़द्दर  की ही दीवार “ख़याल”
तू इधर आ न सका , मैं भी उधर जा न सका
 
 

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