ग़ज़ल
जाने किस बात की अब तक वो सज़ा देता है
बात करता है कि बस जी ही जला देता है
पुर्जा-पुर्जा वो हवाओं में उड़ा देता है
वो हरिक बात पे नशतर-सा चुभा देता है
राह भटका हो कोई राह दिखा देता है
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
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