ग़ज़ल
किसी तूफ़ान की इन बस्तियों पर है नज़र बाबा
हवा है आजकल कैसी तुझे कुछ है खबर बाबा
उठा के सर जरा देखो है उस पर कुछ असर बाबा
जिसे छोड़ा था कल मैंने यही है वो नगर बाबा
ये कैसी है डगर बाबा ये कैसा है सफ़र बाबा
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
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