Thursday, 5 January 2023

ग़ज़ल -43 -मैं तेरा अक्स हवाओं में बना देता हूँ -उड़ान *

 

मैं तेरा अक्स हवाओं में बना देता हूँ

दिल के ज़ख्मों को मैं ऐसे भी  हवा देता हूँ

 

अश्क आंखों कि तपिश से ही जला देता हूँ
आग को आग के पहलू में छुपा देता हूँ

 

याद कर लेता हूँ हर रोज़ तुझे शाम ढले

ख़ुद ही ख़ुद को मैं तडपने की सज़ा देता हूँ


अब वहां तू तो नहीं है ये पता है मुझको

मैं तेरे शह्र में जाता हूँ , सदा देता हूँ

 

ए उदासी तू मेरे पास कभी बैठ ज़रा

मैं तेरे बिखरे हुए बाल बना देता हूँ

 

दिल जो रोया है कभी याद में उसकी तो “ख़याल”

दिल को मैं मीर के कुछ शेर सुना देता हूँ

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