हाँ , दुःख तो है
अब है , सो है
दूर.. कहीं पर
सुख , तो है
सोचो मत तुम
देखो , जो है
दुख का क्या है
सोचो , तो है
ढूँढो, रब्ब को
या मानो , है
क्यों फिर डरना
मरना , तो है
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
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