Thursday, 5 January 2023

ग़ज़ल-46- तुझ पे क़लमकार ,ऐतबार नहीं है- उड़ान*

 ग़ज़ल

तुझ पे क़लमकार ,ऐतबार नहीं है
झूटे हैं अख़बार ,ऐतबार नहीं है
लब पे सजा के रखी है सब ने बनाबट
सब हैं अदाकार ,ऐतबार नहीं है
कौन यहां बेच दे ज़मीर किसी को
ये तो है बाज़ार ,ऐतबार नहीं है
डूब गए हम भँवर में तुझको बचाते
हम पे भी सरकार ,ऐतबार नहीं है ?
तेरा ख़ुदा हूँ यक़ीन करके कभी देख
फैंक दे पतवार ,ऐतबार नहीं है ?
दफ़्न कर इन मौसमों को याद में कहीं
देख ये गुब्बार ,ऐतबार नहीं है
कौन सुनेगा यहां "ख़याल" तेरी बात
सज गए दरबार ,ऐतबार नहीं है

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