Thursday, 16 February 2023

ग़ज़ल -58-ख़ुश्क आंखों में ख़्वाब है फिर से-उड़ान *

 
ख़ुश्क आंखों में ख़्वाब है फिर से
ख़त में लिपटा गुलाब है फिर से
 
फिर से दौड़ी है प्यास सहरा में
और नज़र में सराब है फिर से
 
फिर उदासी है बेसबब सी कोई
शाम है और शराब है फिर से
 
दर पे दस्तक है देखिए तो ज़रा
कौन ख़ाना-ख़राब है फिर से
 
इक तमन्ना ने सर उठाया है
फूटने को हबाब है फिर  से
 
तुमने फाड़ी हैं अर्ज़ियाँ मेरी
यानि मुझको को जवाब है फिर से
 
जिसमें इक ख़त था  ,एक फोटो थी
हाथ में वो किताब है फिर से
 
अब लगावट नहीं किसी से “ख़याल”
आंख पर क्यों पुर –आब है फिर से
 
 
 

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