Thursday, 16 February 2023

ग़ज़ल - 57 -यहाँ मुश्किल है अब मेरा गुज़ारा, अब मैं चलता हूँ -उड़ान *

 

यहाँ मुश्किल है अब मेरा गुज़ारा, अब मैं चलता हूँ
समझ में आ गया है खेल सारा, अब मैं चलता हूँ 
 
ख़यालों के किसी जंगल में यादों का कोई लश्कर
किसी इक याद ने मुझको पुकारा, अब मैं चलता हूँ
 
ये धारे  ,कश्तियाँ , माँझी , समन्दर याद रखूंगा
नज़र आने लगा मुझको किनारा अब मैं चलता हूँ
 
बदन को ओढ़कर जीता रहा बरसों बरस तक मैं
ये चोला था पुराना सो उतारा अब मैं चलता हूँ
 
मिला तू सबसे हसके अपनी महफ़िल में, सिवा मेरे
समझ में आ गया तेरा इशारा,  अब मैं चलता हूँ
 
कहां से हूँ , कहां का हूँ , कहां पे आके बैठे हूँ
गिरा है फ़र्श पर अर्शों का तारा , अब मैं चलता हूँ   
 
“ख़याल” अब ऊब सी है दिल में , घर में और  दफ़्तर में
 बहुत अरसा घुटन सी में गुज़ारा ,अब मैं चलता हूँ

 

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