मुझको कश्ती में भंवर लगता था
नाख़ुदा से ही तो डर लगता था
बाप की घूर से डर लगता था
दूर से देखें तो घर लगता था
घर में जब माँ थी तो घर लगता था
इसलिए मौत से डर लगता था
पेड़ पर फिर ही समर लगता था
कुछ नहीं था हाँ मगर लगता था
बस में बैठो तो सफ़र लगता था
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
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