मुझको कश्ती में
भंवर लगता था नाख़ुदा
से ही तो डर लगता था डांट देना तो बड़ी
बात थी तब बाप की घूर से डर
लगता था पास आये तो दिखी
दीवारें दूर से देखें तो घर
लगता था डांट के मुझको वो रो
पड़ती थी घर में जब माँ थी तो
घर लगता था ज़िंदगी कस के पकड़
रक्खी थी इसलिए मौत से डर
लगता था गीत गाते थे पखेरू
पहले पेड़ पर फिर ही समर
लगता था उसके दिल में तो
लगावट भी न थी कुछ नहीं था हाँ मगर
लगता था
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