मैं न जीता हूँ , तू न हारी है
ज़िंदगी तुझसे जंग ज़ारी है
कितनी हल्की हैं मेरी सब ग़जलें
एक रोटी भी इनसे भारी है
फ़र्ज़ पूरा किया चराग़ों ने
आगे सूरज की ज़िम्मेदारी है
मीर पत्थर जो रोज़गार का है
इश्क़ से भी ज़्यादा भारी है
इसको भी फ़न समझ रहे हैं लोग
नंगे होना भी अदाकारी है ?
मुख़्तसर है सफ़र मुहब्बत का
पास बैठी हुई सवारी है
हां मेरी याद उस दुपट्टे पर
इक चमकती हुई किनारी है
एक मिट्टी के रंग कितने हैं
कौन माली है किसकी क्यारी है
वक़्त क्या है “ख़याल” सुन हमसे
रात –दिन चलने वाली आरी है
Monday, 6 March 2023
ग़ज़ल -61 -न मैं जीता हूँ , तू न हारी है-उड़ान *
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