अभी साया तेरे पाँव के आगे है
सफ़र
में धूप तो छाँव के आगे है
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सुकूँ की छाँव बिपताओं के आगे है
अभी तो धूप ही पाँव के आगे है
यही रहबर हमारा है यही मंज़िल
जो दो गज रास्ता पाँव के आगे है
वहां तक छोड़ने आती थी माँ मुझको
कि वो जो मोड़ इक गाँव के आगे है
कब आयेंगे गए परदेस जो बेटे
ये चिंता मर रही माओं के आगे है
मुकद्दर है,”ख़याल” अब क्या पता क्या हो
कि
ये पत्थर तमन्नाओं के आगे है
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