नाखुदाओ ये चाल
क्यों है फिर
इस नदी में उबाल क्यों है फिर
मौत इक दिन रिहाई दे देगी
ज़िंदगी तेरा जाल क्यों है फिर
गर तमाशा है सब तो ख़ुश रहिए
रंज क्यों है ? मलाल क्यों है फिर
मैं तो साहिल पे हूँ नज़ारे को
पानियों में उछाल क्यों है फिर
ग़र सियासत है नेक नीयत तो
सबका बेहाल हाल क्यों है फिर
सिलसिला है न राबता उससे
दिल में उसका “ख़याल” क्यों है फिर
No comments:
Post a Comment