Monday, 3 April 2023

ग़ज़ल-68-साजिशों के तहत बंटे पत्थर-उड़ान *

 

साजिशों के तहत बंटे पत्थर

और फिर खून से सने पत्थर

नम सी आंखों में ख़्वाब बाक़ी हैं

देख पानी में डूबते  पत्थर

 

वक़्त इक  रेत की नदी जैसा

उसमें हम ढूढ़ते रहे पत्थर

 

यूं ही बेदम पड़े थे सदियों से  

तेरे छूने से जी उठे  पत्थर

 

कैसे कह दूं ख़ुदा नहीं मौजूद

मैंने देखे हैं तैरते पत्थर

 

वक़्त की ठोकरों के सदका ही

फूल से लोग हो गये पत्थर

 

दफ़्न क़ब्रों में फूल से चहरे

देख सीने पे अब  गढ़े पत्थर

 

नर्म लहजा न रास आया मुझे

फूल बांटे थे सर लगे पत्थर

 

आख़िरश कुछ न बन सका तो ख़याल

हमने सीने पे रख लिए पत्थर

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