यही सिस्टम की साज़िश है कि तुम मजबूर हो जाओ
किसानी छोड़कर , मिल में कहीं मज़दूर हो जाओ
बदल लो लहज़ा अपना ,चाल अपनी , बात अपनी तुम
कि सत्ता मिल गई है , रहबरो ! मग़रूर हो जाओ
हवाएँ साज़िशों की , घर जला देंगी , ज़रा बच के
ये चिंगारी सियासी है , ज़रा सा दूर
हो जाओ
अँधेरा ही मुकद्दर है , ग़रीबों से कहा उसने
तम्हारे रब्ब की मर्ज़ी है कि तुम बेनूर हो जाओ
हवा ,पानी ख़रीदो तुम, किराए के मकानों में
बसो शहरों में जाकर , गाँव से तुम दूर हो जाओ
मैं शायर हूँ , मेरा क्या है , पड़ा रहने दो कोने में
दुआ मेरी लगे, ए मस्ख़रो ! मशहूर हो जाओ
“ख़याल” अब थक गया
हूँ , रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरके मैं
मेरे ज़ख्मों ! गुज़ारिश है , कि तुम नासूर हो जाओ
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