Wednesday, 24 May 2023

ग़ज़ल -81-यही सिस्टम की साज़िश है की तुम मजबूर हो जाओ-उड़ान *

 

यही सिस्टम की साज़िश है कि तुम मजबूर हो जाओ
किसानी छोड़कर , मिल में कहीं मज़दूर हो जाओ
 
बदल लो लहज़ा अपना ,चाल अपनी , बात अपनी तुम
कि सत्ता मिल गई है , रहबरो ! मग़रूर हो जाओ
 
हवाएँ साज़िशों की , घर जला देंगी ,  ज़रा बच के
ये चिंगारी सियासी है ,  ज़रा सा  दूर हो जाओ
 
अँधेरा ही मुकद्दर है ,  ग़रीबों से कहा उसने
तम्हारे रब्ब की मर्ज़ी है कि तुम बेनूर हो जाओ
 
हवा ,पानी ख़रीदो तुम,  किराए के मकानों में
बसो शहरों में जाकर , गाँव से  तुम दूर हो जाओ
 
मैं शायर हूँ  , मेरा क्या है , पड़ा रहने दो कोने में
दुआ मेरी लगे, ए मस्ख़रो ! मशहूर हो जाओ
 
“ख़याल” अब थक गया हूँ , रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरके मैं
मेरे ज़ख्मों !  गुज़ारिश है , कि तुम  नासूर हो जाओ
 
 

No comments:

Post a Comment

करतब ने भरमाई आँख

करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख   आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख   दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी   फिर ख़ाली लौट के आई आँख   मंज़र ,  पस-मंज़...