मैं हैराँ था , अजब क़िस्सा हुआ था
कि पत्ता शाख़ से रूठा हुआ था
दिलासा ख़ुद को दे लते हैं यूं हम
कि सब किस्मत का ही लिक्खा हुआ था
तसव्वुर में बुने थे जाल मैंने
मैं अपनी सोच में भटका हुआ था
मुझे समझा रहे थे, क्या है दुनिया
जहन्नम तो मेरा देखा हुआ था
ज़बां मीठी थी, बरछी थी बग़ल में
वही धोखा था , दोबारा हुआ था
किसी की जुस्तजू मैं कैसे करता
मैं अपने आप से बिछड़ा हुआ था
शिकायत थी मुझे दुनिया से भी पर
मैं अपने घर में ही बिखरा हुआ था
ज़रा ठहरो जो मौत आये तो चलना
कि अपने आप को रोका हुआ था
“ख़याल” इक घाव था बरसों पुराना
जो भर कर और भी गहरा हुआ था
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