Monday, 15 May 2023

ग़ज़ल -79-घर से दफ़्तर, दफ़्तर से घर, कैसा चक्कर चलता है- उड़ान*

 

घर से दफ़्तर, दफ़्तर से घर,  कैसा चक्कर चलता है

घर में बैठे होते हैं पर मन में दफ़तर चलता है

 

कितने ही दरिया हैं जो बस रेत से उलझे रहते हैं

कुछ दरिया ऐसे हैं जिनके साथ समन्दर चलता है

 

बच्चे नौकर बनने को इस्कूल गये हैं और पिता

जूते –फीते कसके घर से,  नौकर बनकर चलता है

 

चूल्हा जलता रखने को बस , दिन भर जलते हैं हम लोग

कितने समझौते करते हैं, तब जाकर घर चलता है

 

सच्ची बातें , अच्छी बातें , सब जंजाल किताबी है

सच कहता हूँ , झूठ का सिक्का खोटा है, पर चलता है

 

देख रहे होते हैं दिन भर शातिर लोगों की लीला

थक कर सो जाते हैं तो फिर ख़्वाब में मंज़र चलता है

 

रोज़ी –रोटी , घर की चिंता , मर-मर जीते लोग “ख़याल”

माँ की कोख़ से मरघट तक, हर मन में ये डर चलता है

 

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