अब वहां जाके कोई क्या बैठे
उसकी महफ़िल में सब ख़ुदा बैठे
कुछ लगावट न थी मरासिम में
इसलिए हम जुदा - जुदा बैठे
हम हैं, दुःख हैं , ये ना-उमीदी है
हम ये कैसी जगह पे आ बैठे
बाग़ में सैर करने आये थे
पेड़-पौधों से दिल लगा बैठे
जिस जगह से सफ़र किया था शुरू
फिर उसी मोड़ पर हैं आ बैठे
उसने रस्मन कहा था कैसे हो
हम तो दुख -सुख उसे सुना बैठे
अब फ़क़ीरी में डर नहीं है “ख़याल”
पास जो कुछ था वो लुटा बैठे
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