चुप रहते हैं, सह लेते है , सो जाते हैं.. और फिर बस
ना-इंसाफ़ी
के हम आदी हो जाते हैं ..और फिर बस
चोर-सिपाही हम प्याला हैं ,पहरेदार भी साथी है
और खज़ाने इक दिन ख़ाली हो जाते हैं.. और फिर बस
बेसिर पैर की टीवी पर कुछ चर्चा चलती रहती है
असली मुद्दे इस चिल –पों में खो जाते हैं.. और फिर बस
बचपन और जवानी बीती ,फिर
लाठी से मरघट तक
हम मिट्टी में मिलकर मिट्टी हो जाते हैं.. और फिर बस
संसद में है शोर –शराबा , सड़कें हैं ख़ामोश “ ख़याल”
मुद्दे सारे गौण हमारे हो जाते हैं ...और फिर बस
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