ग़ज़ल –
चल मन तू वीरानी लेकर अब जलते शमशानों में
क्या रक्खा है मुर्दा बस्ती के मुर्दा इंसानों में
सारी दुनिया को अपना परिवार बताने वालों ने
अपना ही घर बाँट दिया है देखो कितने ख़ानों में
रोज़ी –रोटी की चिंता में डूब रहे पढ़ कर बच्चे
ना उम्मीदी बैठ गई है कैसे नन्हीं जानों में
घन्टों गप-छप चलती थी , घर-घर में रौनक होती थी
चुप सी छाई रहती है अब , घर , आंगन , दालानों में
उम्मीदों से भर देती है , तेरे आने की ख़बरें
दस्तक देने लग जाती है , धूप इन रौशन- दानों में
सुख तो घर की चाय की इक प्याली में मिल सकता है
लेकिन उसको ढूँढ रहे हम बाज़ारों , दूकानों में
ज्यूँ की त्युं रहती है हालत , तंगी में जीते हैं लोग
दिन अच्छे लगते हैं केवल सरकारी एलानों में
घर में सबका अपना कमरा, लेकिन आँगन ख़ाली है
दीवारों ने बाँट दिया घर , देखो कितने ख़ानों में
ख़ुशबू के मरने का ज़िम्मा मेरे सर आता है “ख़याल”
मैंने नकली फूल सजाये थे घर के गुल-दानों में
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