Monday, 21 August 2023

ग़ज़ल -90- क़ैद था आंखों में इक ग़म का पहाड़-उड़ान *

 
क़ैद था आंखों  में  इक ग़म का पहाड़
एक आंसू  क्या गिरा ,  दरका पहाड़

बादलों से रोज़  लड़ता था  पहाड़
छिन गई हिम्मत  तो  फिर टूटा पहाड़

हमने  जब मिट्टी  जड़ों से  काट दी
फिर तो  घुटनों पर ही  आ बैठा पहाड़ 

ग़र ज़मीं  प्यासी नहीं  तो मत बरस
बादलों से इल्तिजा करता  पहाड़
 
ले गया  पानी बहा कर  कितने घर
अब पहाड़ों  पर कोई  टूटा पहाड़
 
आरियों , कुल्हाड़ियों  की  धार  ने 
थोड़ा -थोड़ा  रोज़  काटा   था पहाड़ 
 
घुल गया आँखों के पानी में  “ख़याल”
नम सी आंखों में हो ज्यूँ सुरमा पहाड़
 

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